Sunday, April 11, 2010
परछाई की काली स्याही से... फिर वही आदत ...
याद है अब मुझे बस मेरे बचपन की वोह आदत...
आपकी मेरी और देख मुस्कुराने की वोह आदत...
मेरे घबराने और आपकी हिम्मत बाँधने की वोह आदत...
" तू जो चाहे कर " ....
आता नहीं समझ अब तो की चाहत क्या है और होनी क्या है ...
याद है तो बस आपकी "होनी अटल है" कहने की वोह आदत...
उलझन में हूँ...
आपकी चलते रहने की आदत सहेजूं ...
या मेरी मुस्कान से आपकी ख़ुशी समेटू...
आदत से कौन अछुता है... इससे से तो हर ताना बना है...
में भी तो आपकी उस आदत का हिस्सा हूँ ...
पंक्ति...
http://www.ablemuse.com/v7/images/features/father-forgot.jpg
Friday, March 12, 2010
स्नेह की गुलाबी स्याही से .... "आदत"

आदत से कौन अछुता है... इससे से तो हर ताना बना है...
कह जाये बस कोई इतना, की मुझे इसकी आदत है...
कही फूल खिल जाते है, कही दिल उदास हो जाते है...
किसी की मुस्कान है आदत, किसी के आसू है आदत,
कोई देखे बस इन्हें गौर से...
तो फ़साना लिखती है ये आदत ...
कितनी सुन्दर है ये आदत... चित्रकार या कलाकार है ये आदत?
आदत से कौन अछुता है... इससे से तो हर ताना बना है...
आदत राह बनती है, आदत से ही बोझिल हो जाती है...
कुछ कहती है आदत, कोई सुने बस इससे गौर से....
किसी की आदत, "आदत" बन जाती है ...
आदत से कौन अछुता है... इससे से तो हर ताना बना है...
उसकी काली, बड़ी, गहरी आखो के बीच कुमकुम सा बड़ा टिका ,
लो बन गई एक आदत...
आदत से कैसे मुह चुराए कोई, जब दिल की धड़कन ही बन जाये ये आदत....
आदत से कौन अछुता है.. इससे से तो हर ताना बना है...
आदत की ख़ामोशी, मन में शोर छोड़ जाती है,
तो किसी की खिलखिला कर हँसती आदत,
मनन शांत कर जाती है....
पंक्ति....
Saturday, January 30, 2010
शांत सफ़ेद स्याही से ... आपस की बात ....
ए मन मेरे मन ..
छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा,
फूलों की पंखुड़ी सा मुस्कुरा ..
मुरझाना तो है तुझे एक दिन ..
उस दिन को इतनी जल्द ना बुला ...
ए मन मेरे मन ..
छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा...
ओस की बूँद से तो पत्थर भी,
चमकता है ...
तू सितारे सा तो टिमटिमा ...
सागर ना सही तेरी किस्मत में ...
तो लहरों से खुश होजा ...
ए मन मेरे मन ..
छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा...
हसने से है प्यार मिला ...
जीने को है जज़्बा मिला ...
जो नहीं है, उसको सोच ...
मुझे तो ना रुला ...
ए मन मेरे मन ..
छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा...
एक पल में मुस्कराहट ...
दूजे पल हैं मोती झरते ...
बूंद बूंद कर हल्का करते ...
फिर क्यों है बिखरा करते ...
ए मन मेरे मन ..
छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा...
सब जनता है तू, सब समझता है तू ...
फिर जल - जल बुझता है क्यों?
अच्छे बुरे का भेद करता है तू ...
फिर अंजना सा डर, तुजे खता है क्यों?
ए मन मेरे मन ....
पंक्ति....
गहरायी की नीली स्याही से ... आवाजें
उसने कहा -
कोई अपनी ही नज़र से तो देखेगा हमें...
एक कतरे को समुन्दर नज़र आये कैसे...
हाँ सही कहा तुमने...
कोई अपनी ही नज़र ही नज़र से तो देखेगा हमें
एक कतरा देखता है खुद से अनगिनत कतरों की जरुरत को
जो समाये हैं समुन्दर में ...
समुन्दर उसे समझ पाए कैसे ...
कोई था दरवाज़े पर जो सब सुन रहा था ... अजनबी था ...
रोक न पाया खुद को, बोल पड़ा ...
समझेगा वोह कतरा, समुन्दर को...
समझेगा वोह समुन्दर उस कतरे को...
बस अपने आप से उभर पाए कैसे...
कुछ था इस छोटी बात में... जो हलकी न थी...
सब शांत थे... मनो वहां रक्खी चीज़ें थी ...
पंक्ति....
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