Saturday, January 30, 2010

शांत सफ़ेद स्याही से ... आपस की बात ....






ए मन मेरे मन ..

छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा,
फूलों की पंखुड़ी सा मुस्कुरा ..
मुरझाना तो है तुझे एक दिन ..
उस दिन को इतनी जल्द ना बुला ...

ए मन मेरे मन ..
छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा...

ओस की बूँद से तो पत्थर भी,
चमकता है ...
तू सितारे सा तो टिमटिमा ...
सागर ना सही तेरी किस्मत में ...
तो लहरों से खुश होजा ...

ए मन मेरे मन ..
छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा...

हसने से है प्यार मिला ...
जीने को है जज़्बा मिला ...
जो नहीं है, उसको सोच ...
मुझे तो ना रुला ...

ए मन मेरे मन ..
छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा...

एक पल में मुस्कराहट ...
दूजे पल हैं मोती झरते ...
बूंद बूंद कर हल्का करते ...
फिर क्यों है बिखरा करते ...

ए मन मेरे मन ..
छुईमुई बनकर खुद को ना दुखा...

सब जनता है तू, सब समझता है तू ...
फिर जल - जल बुझता है क्यों?
अच्छे बुरे का भेद करता है तू ...
फिर अंजना सा डर, तुजे खता है क्यों?

ए मन मेरे मन ....

पंक्ति.... 

गहरायी की नीली स्याही से ... आवाजें







उसने कहा - 
कोई अपनी ही नज़र से तो देखेगा हमें...
एक कतरे को समुन्दर नज़र आये कैसे...

हाँ सही कहा तुमने...
कोई अपनी ही नज़र ही नज़र से तो देखेगा हमें
एक कतरा देखता है खुद से अनगिनत कतरों की जरुरत को
जो समाये हैं समुन्दर में ...
समुन्दर  उसे  समझ  पाए  कैसे ...

कोई था दरवाज़े पर जो सब सुन रहा था ... अजनबी था ...
रोक न पाया खुद को, बोल पड़ा ...

समझेगा वोह कतरा, समुन्दर को...
समझेगा वोह समुन्दर उस कतरे को...
बस अपने आप से उभर पाए कैसे...

कुछ था इस छोटी बात में... जो हलकी न थी...
सब शांत थे... मनो वहां रक्खी चीज़ें थी ...


पंक्ति....