Sunday, April 11, 2010
परछाई की काली स्याही से... फिर वही आदत ...
याद है अब मुझे बस मेरे बचपन की वोह आदत...
आपकी मेरी और देख मुस्कुराने की वोह आदत...
मेरे घबराने और आपकी हिम्मत बाँधने की वोह आदत...
" तू जो चाहे कर " ....
आता नहीं समझ अब तो की चाहत क्या है और होनी क्या है ...
याद है तो बस आपकी "होनी अटल है" कहने की वोह आदत...
उलझन में हूँ...
आपकी चलते रहने की आदत सहेजूं ...
या मेरी मुस्कान से आपकी ख़ुशी समेटू...
आदत से कौन अछुता है... इससे से तो हर ताना बना है...
में भी तो आपकी उस आदत का हिस्सा हूँ ...
पंक्ति...
http://www.ablemuse.com/v7/images/features/father-forgot.jpg
Subscribe to:
Comments (Atom)

