ये दो अनजानी राहें...
राहों से राहें कुछ यूँ मिलीं,
की बेगानी ना रहीं,
ये दो अनजानी राहें...
फूलों में ओस सी समां गयीं,
सीप में मोती सी मिल गयीं,
ये दो अनजानी राहें...
हाथ में लकीर सी छप गयीं,
बाँहों में छुईमुई सी सिमट गयीं,
ये दो अनजानी राहें...
कब मोम सी पिघल गयीं पता ही ना चला,
बड़ी सी गर्म हथेली में,
कब ठण्ड नर्म हुई, पता ही ना चला,
सांस कब थमी कब तेज़ हुई पता ही ना चला,
ये "दो" अनजानी राहें...कब "एक" हुई पता ही ना चला,
ये "एक" अनजानी राहें...
ये "एक" अनजानी राहें...
पंक्ति....

