Saturday, January 30, 2010

गहरायी की नीली स्याही से ... आवाजें







उसने कहा - 
कोई अपनी ही नज़र से तो देखेगा हमें...
एक कतरे को समुन्दर नज़र आये कैसे...

हाँ सही कहा तुमने...
कोई अपनी ही नज़र ही नज़र से तो देखेगा हमें
एक कतरा देखता है खुद से अनगिनत कतरों की जरुरत को
जो समाये हैं समुन्दर में ...
समुन्दर  उसे  समझ  पाए  कैसे ...

कोई था दरवाज़े पर जो सब सुन रहा था ... अजनबी था ...
रोक न पाया खुद को, बोल पड़ा ...

समझेगा वोह कतरा, समुन्दर को...
समझेगा वोह समुन्दर उस कतरे को...
बस अपने आप से उभर पाए कैसे...

कुछ था इस छोटी बात में... जो हलकी न थी...
सब शांत थे... मनो वहां रक्खी चीज़ें थी ...


पंक्ति....

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