आशा की नारंगी स्याही से... तलाश...
सहमी सी में, निकली हूँ घर से..
मुस्कुराती हुयी में, मिलती हूँ सबसे..
लोग मेरे आस - पास अभी अनजाने हैं..
अब यही मेरे अपने होंगे, यह मानती हूँ में..
कौन अपना, कौन पराया..
बिना जाने चल पड़ी हूँ में ..
सहमी सी में, घर से निकली हूँ में ..
मुस्कुराती हुयी में, मिलती हूँ सबसे..
लोग मेरे आस - पास अभी अनजाने हैं..
अब यही मेरे अपने होंगे, यह मानती हूँ में..
कौन अपना, कौन पराया..
बिना जाने चल पड़ी हूँ में ..
सहमी सी में, घर से निकली हूँ में ..
अनजानी जगह अपना घोंसला बनाने, जारही हूँ में ..
ना मंजिल, ना मुकाम..
जाने किस चैन की तलाश में, निकल पड़ी हूँ में..
ना मंजिल, ना मुकाम..
जाने किस चैन की तलाश में, निकल पड़ी हूँ में..
पंक्ति....
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