Tuesday, September 18, 2012

उलझन की चितकबरी स्याही से ... "बेखबर"






सहमी सी धड़कन .. कुछ कहती है शायद ..
दबी सी आशा .. इसमें रहती है शायद ..
कभी कहती कभी छुपती ..
खुद से ही बातें करती है शायद ..

अपनी ही चाहत से बेखबर ..
बनती है शायद ..

मौन न रहा जाये इससे ..
युहीं निकल जायें सब किस्से ..
खुली किताब होने की ..
कोशिश करती है शायद ..

अपनी ही आदत से बेखबर ..
बनती है शायद ..

दबी दबी मुस्कान लेकर ..
झूठी सी इस शान में बहकर ..
कतरा कतरा ख़ुशी ..
कुचलती है शायद ..


अपनी ही राह से बेखबर ..
चला करती है शायद ..

सहमी सी धड़कन .. कुछ कहती है शायद ..
दबी सी आशा .. इसमें रहती है शायद ..


पंक्ति ....


Image Source : Unknown

व्यथा की काली स्याही से... "हाद्सा"






उम्मीद की ओस,
हरयाली और रास्ता,
दुर्भाग्य से अड़ा पत्थर,
और हुआ एक हाद्सा,

दूर खड़ा मुसाफिर,
और उसकी आस्था,
अफ़सोस जताता मन,
और उसका अपना एक रास्ता,

मुसाफिर के लिए "एक पल",
उसके जीवन का हाद्सा,

"एक पल" की नसीहत,
उसके जीवन की लालसा,
"एक पल" की हकीकत,
जीवन भर की गाथा.....


पंक्ति .....


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Thursday, September 6, 2012

कल्पना की रंगीन स्याही से .... "लिका - छिपी"





धुंध से निहारती जीवन की किरण,
लिकती छिपती जैसे हिरन,
कभी लुभाती कभी रुलाती,
सहसा ही  मुस्कुराती,
दबे पाँव फिर खो जाती,

मासूम सी जिंदगी,
फिर शातिर चित्रकार हो जाती,

समझ ना पाऊं,
इसकी समझ मैं तो,
दिया जलाने जाऊं भर मैं,
यह खुद ही तूफ़ान बन आती,

छिपने की इस आदत में यह,
कितना है मुझको सताती,
पहुँच भी जाऊं गर मैं करीब इसके,
झट से रूप बदल कर यह,
फिर मौत सी नज़र आती,

सहसा ही  मुस्कुराती,
दबे पाँव फिर खो जाती....


पंक्ति....


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