धुंध से निहारती जीवन की किरण,
लिकती छिपती जैसे हिरन,
कभी लुभाती कभी रुलाती,
सहसा ही मुस्कुराती,
दबे पाँव फिर खो जाती,
मासूम सी जिंदगी,
फिर शातिर चित्रकार हो जाती,
समझ ना पाऊं,
इसकी समझ मैं तो,
दिया जलाने जाऊं भर मैं,
यह खुद ही तूफ़ान बन आती,
छिपने की इस आदत में यह,
कितना है मुझको सताती,
पहुँच भी जाऊं गर मैं करीब इसके,
झट से रूप बदल कर यह,
फिर मौत सी नज़र आती,
सहसा ही मुस्कुराती,
दबे पाँव फिर खो जाती....
पंक्ति....
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